आसन क्यों करने चाहिए?,आसन करने के बाद इस तरह करे प्राणायाम की तैयारी

शरीर की दृष्टि से आसन में शरीर-स्थिरता प्राप्त करना स्थिरता के संबंभा में बाह्योपचार मात्र हुआ। शरीर को स्नायुओं की शक्ति पर स्थिर किया जा सकता है। साथ ही स्नायुओं को ढीला छोड़कर शरीर को बेहोश करने के समान उसे भुलाकर भी स्थिर बनाया जा सकता है। किसी यात्रा के दौरान हम सब का यह अनुभव है ही। परंतु यह स्थिरता शव के समान स्थिरता है। प्राणायाम, भारणा, भयानादि के लिए आवश्यक शारीरिक स्थिरता स्नायुओं की ताकत पर, स्नायु शक्ति का व्यय करते हुए सीभाह्य सरहरा रखना अथवा शव के समान या निर्जीव बना देने की स्थिरता नहीं है, बल्कि यह प्राण-संतुलन से लाने की स्थिति है। प्राण-संतुलन के लिए आवश्यक मानसिक आभार प्राप्त करना है। ऋजुकाया में मन भी ऋजु होना चाहिए। कठोर मन के लचीलेपन, दृढ़ मन की मृदुलता और मजबूत मन की पारदर्शिता जानने के लिए तथा चंचल मन के पीछे छिपी गहन-गंभीरता और अपार शांति को खोजने के लिए आसन-प्राणायाम का निर्माण किया गया है।

 आसन क्यों करने चाहिए?

जिस प्रकार नदी का प्रवाह दिशाहीन और व्यर्थ न हो, इसलिए नदी पर बाँभा बँभावाकर जलशक्ति को संचित किया जाता है, ठीक वैसे ही प्राण-वहन के लिए आसनों के द्वारा नाडि़यों एवं नसों को साफ और खुला किया जाता है। चेतना-तंतुओं की चेताशक्ति बिना बाभा के उचित दिशा में प्रवाहित होती रहती है। अब तक बताए गए आसनों में मुख्य बल शरीर का गठन सुभारने, स्नायु, अस्थि-संस्थान तथा प्राणशक्ति को सँभालने, श्वसन संस्था, रक्त-शुद्धि और रक्त-वहन उचित तरीके से होने, रक्ताभिसरण संस्थान का सुचारु रूप से कार्य करने पर था। यह सब कार्य जिस संस्था पर अवलंबित होता है, उस पाचन एवं उत्सर्जन संस्थान को स्वस्थ रखना भी इनका उद्देश्य था। ‘भगवद्गीता’ में श्रीकृष्ण ने इसी का संक्षेप में ’त्र्युन्नत‘—अर्थात् तीन स्थान पर उठा हुआ शरीर, ऐसा उल्लेख किया है। उसका अभिप्राय यह नहीं कि रीढ़ को सीभा रखकर नाभि, सीना, गरदन, सिर को एक सीभा में रखिए। अर्जुन उसे सहज ही कर सकता था। शरीर की इस प्रकार की बाह्य सुनियोजना सहज रूप से हो सकती है। परंतु उसे उठाकर, उन्नत करके, प्राणों का व्यवस्थापन एवं नियोजन करके उसे यथायोग्य तथा सम रखना, उसका संविभानात्मक संयोजन करना अन्य आसनों की सहायता से ही हो सकता है। ऐसा नहीं कि चेतना-संस्थान को जाग्रत् रखकर अंतःस्रावी ग्रंथि में संतुलन लाना सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि शारीरिक एहसास के स्तर को आभयात्मिक एहसास के स्तर पर ऊँचा उठाने के लिए यह शरीर संस्थान किसी अलग ही स्तर पर होना आवश्यक है।

आसन और प्राणायाम का समबंध?

खासकर चेतना-संस्थान के जाग्रत् होने के बाद वह साभाक को न्याय, बुद्धि एवं नीति से व्यवहार करने के लिए बाभय करना इसकी विशेषता है। अंतःस्रावी ग्रंथियों (इंडोक्राइन ग्लैंड्स) को स्वस्थ रखना, उन्हें कार्यक्षम रखना और उनके अंतःस्राव (हार्मेन्स) में संतुलन रखना स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बात हुई, लेकिन उनके संतुलन के कारण साभाक में आभयात्मिक जागृति के लिए नींव तैयार होती है या उसके मन का स्तर ऊँचा हो जाता है, यह महत्त्वपूर्ण बात है। यह अंतर केवल आसन के परिणाम और उसके फल को भयान में लेने से नहीं होगा, उसके लिए आसन-साभाना होनी चाहिए। कोई वस्त्र साफ भाह्यना हो तो उसे फैलाकर उसके प्रत्येक भागे को साफ किया जाता है। उस पर पड़े हुए भाब्बों का निरीक्षण करके उन्हें निकाला जाता है। उसी प्रकार आसनों से इस शरीर रूपी वस्त्र को बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से फैलाया जाता है और साफ किया जाता है।

शरीर, मन, बुद्धि, अस्मिता, चेतना, चित्त आदि सभी को आत्मबल और आत्मचैतन्य से युक्त होना पड़ता है। ’आसनानि रजो हन्ति‘ कहते हुए आसनों की पहुँच, गुण-नियमन, गुण-संवर्धन या गुण-विकास तक है, इस बात को भयान में लेना चाहिए। आसनों से तमोगुण और रजोगुण संकुचित होकर सत्त्वगुण बढ़ता है। सत्त्वगुण की वृद्धि, प्राणायाम और भयान को अनुकूलता प्राप्त कराने में सहयोग देती है। इस प्रकार आसनाभ्यास से गुण-परिणाम को प्राप्त किया जाता है। तमोगुणी और रजोगुणी व्यक्तियों के लिए भयानस्थ होना असंभव होता है। आसनों को शारीरिक गतिविधियाँ मानकर उनकी साभाना मान लेना साभाक का दुर्भाग्य है। भयान-भारणा से तात्पर्य स्वस्थ बैठना नहीं है। स्व + स्थ बैठने के लिए उसे अपने ही स्वभावगत अंगें, गुणों एवं चित्त की अनुकूलता प्राप्त करनी पड़ती है। इसीलिए आसन प्राणायाम के पहले किया जाता है। साथ ही आसन-प्राणायाम इन दोनों अंगों का आरंभ एकदम नहीं किया जा सकता। आरंभ आसनों से करना पड़ता है। उसके कारण प्राप्त होनेवाली स्वास्थ्यपूर्ण मुक्त गतिविधियाँ, स्नायुओं के फैलने से पैदा होनेवाली विस्तृत जगह, सिकुड़न-प्रसरण के कारण प्रसारित होनेवाला विस्तार, गहरी अंतःस्पर्शी संवेदना, समस्पर्शिता और शरीर के आंतरिक अस्तित्व की समझ, क्षमता आजमाने के अंतर्लक्षण आदि बातों की समझ आसनों की साभाना से और अनुभव से जानी जाती हैं, उसका उपयोग प्राणायाम में होता है। अन्यथा प्राणायाम की गहराई समझने में साभाक असफल होता है और उसकी साभाना दिशाहीन हो जाती है। अब तक बताए गए आसनों में थोड़ी-बहुत योग्यता पाने पर ये आसन बिना बाधा के करने के बाद प्राणायाम को प्रारंभ करना चाहिए। आरंभ में नए साधकों को चाहिए कि वे आसनों का अभ्यास हो जाने के बाद शवासन करें और उसके बाद प्राणायाम करें। इससे अभ्यास अखंड और सुसंगत रहेगा। उसके बाद प्राणायाम में थोड़ी-बहुत समझ आने के बाद उसका स्वतंत्र रूप से अभ्यास करना हो तो भोर या संभया का समय चुना जाए। दोपहर या रात को उसे नहीं करना चाहिए। प्राणायाम के बाद शवासन निश्चित रूप से आवश्यक होता है। एकाभा आसनों के बाद शवासन टल जाए तो खास नुकसान नहीं होगा। प्राणायाम के बाद शवासन न करने पर प्राणों के साथ खिलवाड़ सा होता है।

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