इन सर्वोत्तम उपाय से करे पित्त प्रकृति को संतुलित : Pitaa Prakrati

मस्तिष्क तथा शरीर की सभी क्रियाएँ संयमित होनी चाहिए। पित्त को ठंडे भोजन, ठंडी वायु तथा ठंडे वातावरण से संतुलित किया जाता है। पित्त दोषवाले लोग बड़े आक्रामक तथा गरम मिजाज होते हैं। तीखा, खट्टा तथा नमकीन भोजन पित्त दोष को असंतुलित कर देता है। अल्कोहल युक्त पेय भी पित्त को उत्तेजित करते हैं। ऐसे लोग क्रोधी, जिद्दी, झगड़ालू और अत्यंत भावुक होते हैं। पित्त को संतुलित करने में आराम बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मस्तिष्क तथा शरीर दोनों को आराम मिलना चाहिए। यह आपकी भावनाओं, बेचैनी तथा तनाव को नियंत्रित करता है।

पित्त को संतुलित कैसे करें

ठंडा भोजन करें। गरिष्ठ भोजन नहीं करना चाहिए।  दिमाग को शांत रखने तथा किसी प्रकार की आक्रामकता से बचने के लिए ध्यान सर्वोत्तम उपाय है। आराम करें और किसी भी प्रकार के तनाव से दूर रहें।  ठंडी चीजें पित्त को नियंत्रित करती हैं। ठंडे पानी से स्नान करना भी अच्छा रहता है।  जब पित्त बढ़ जाता है तो ठंडे और मीठे फलों का रस लेने की सलाह दी जाती है। किशमिश, अंगूर तथा सेब का रस लाभदायी होता है।  तरल पदार्थों का सेवन अधिक-से-अधिक करें।  संभव हो तो पानी से घिरे हुए स्थान में रहें।  बहुत ठंडे खाद्य पदार्थ नहीं लेने चाहिए, क्योंकि वे पाचक अग्नि को शांत करते हैं।  पित्त को शांत करनेवाला आहार लें । एक समय का भी भोजन न छोड़ें, क्योंकि यह अल्सर का कारण बन सकता है। यदि पाचन-क्रिया तीव्र है तो दूध में चीनी मिलाकर पीएँ। इससे पित्त संतुलित होगा। यदि अधिक भूख और प्यास लगे तो पित्त शमित करनेवाला आहार लेकर उसे संयमित रखें। अत्यधिक भूख को आहार कम करके नहीं, बल्कि कड़वी सब्जियाँ, जैसे कड़वी लौकी, फलियाँ और हरी सब्जियाँ लेकर शांत किया जा सकता है। यह सब ‘चरक संहिता’ में वर्णित है। सॉफ्ट ड्रिंक्स से परहेज करें, क्योंकि ये पित्त को बढ़ाते हैं। शराब पाचक अग्नि के लिए पेट्रोल की तरह है, जो भूख को असामान्य बनाकर आँतों तथा यकृत को जलाती है। डबल रोटी तथा खमीर उठे पदार्थ भी पित्त प्रकृति के लोगों के लिए स्वास्थ्यकर नहीं हैं। दस्तावर पदार्थ पित्त दोष को संतुलित करने के लिए सर्वोत्तम होते हैं। अरंडी का तेल भी इसके लिए उत्तम है।

पित्त प्रकृति में सावधानियाँ

पेट के अल्सर तथा आँतों के विकारवाले लोग अरंडी के तेल का प्रयोग न करें, क्योंकि यह आँतों तथा छिद्रों को नुकसान पहुँचा सकता है। शरीर में यदि पानी की कमी महसूस हो तो कुनकुना पानी पीना उचित रहता है। इससे अगले दिन व्यक्ति हलका और ताजा महसूस करेगा। कुनकुना पानी पाचक तथा अधिक मूत्र उत्पन्न करनेवाला होता है। ‘विरेचन’ के अगले दिन नारंगी या सेब का रस लेना चाहिए।  शुद्ध भोजन, पानी तथा वायु पित्त प्रकृति के लोगों के लिए उपयुक्त होते हैं। कृत्रिम खाद्य मिश्रण से परहेज करें, क्योंकि वे चयापचय संबंधी बाधाएँ उत्पन्न करते हैं और पित्त को असंतुलित करते हैं। ध्यान देने योग्य बातें 1. धूप से बचें। 2. यथासंभव आग के पास न जाएँ। 3. सुबह तथा शाम को स्वच्छ-शीतल हवा में भ्रमण करने से पित्त संतुलित होगा। चंदन का शीतल लेप पित्त को संतुलित करने के लिए अच्छा रहता है। 4. हिंसक फिल्मों, पुस्तकों, उत्तेजक टी.वी. धारावाहिकों तथा धूम्रपान से परहेज करें, क्योंकि ये सब पित्त को बढ़ाते हैं। 5. मन को शांत करनेवाले कर्णप्रिय गीत व संगीत सुनें। खुलकर हँसना पित्त दोष के लिए सबसे बढि़या दवा है। प्रकृति तथा सौंदर्य का आनंद उठाएँ, ये भी पित्त को शांत करते हैं।

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