शंख-प्रक्षालन आसान के फायदे और सावधानियाँ – shankh-prakshaalan

यदि हम अपने शरीर पर दृष्टि डालें और यह सोचें कि पूरे शरीर को कौन सा अंग विशेष रूप से प्रभावित करता है ? ऐसा कौन सा अंग है जो कि हमारे इस पूरे शरीर को पोषकता प्रदान करता है? ऐसा कौन सा अंग है जिसके लिए व्यक्ति सुबह से शाम तक कमाता है तो उत्तर एक ही आएगा और वह है पेट (उदर)। आदमी इसी पेट के लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाता है और इसी पेट की वजह से पूरा शरीर संचालित होता है। अब चूँकि हमें मालूम है कि इसी पेट की वजह से हमारा शरीर, अस्वस्थ होता है तो क्यों हम इस पेट में ख़राब वस्तु डालें अर्थात् हम क्यों ऐसी खाद्य सामग्री का सेवन करें जो कि हमें आज नहीं तो कल नुक़सान पहुँचाएगी और जिसके कारण हमारे पूरे उदर-प्रदेश का प्रबंधन ख़राब होता है। जिसकी वजह से सैकड़ों प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं।

शंख-प्रक्षालन के लाभ

शंख-प्रक्षालन क्रिया ​पेट की कृमि एवं आँतों में पनपने वाले अमीवा को यह बाहर निकाल देता है और नूतन पाचक रसों को श्रावित कर पाचन सँस्थान का कायाकल्प कर देता है। ​यदि उपरोक्त विधि व सावधानियों का पालन किया जाए तो मोटापे से पीड़ित व्यक्ति का वजन सप्ताह भर में 3 से 4 किलो तक कम हो जाता है और दुबले-पतले क्षीण काय व्यक्ति में नवीन ऊर्जा का संचार होता है। ​उदर-विकार सम्बंधी समस्त बीमारियों का नाश होता है। चाहे वह क़ब्ज़ हो, वायु दोष हो, पित्त दोष हो या कफ़ दोष हो, इस प्रकार यह त्रिदोष नाशक है। ​शरीर का कायाकल्प करके यौवन प्रदान करता है। चर्म रोग मिटाता है। ​आज विकराल रूप ले चुका मधुमेह इस क्रिया से शनै: शनै नाश को प्राप्त होता है। आलसपन समाप्त होता है। ​इस क्रिया के बाद व्यक्ति स्वयं को हल्का व पूर्ण स्वस्थ महसूस करता है साथ ही मानसिक रूप से भी पूर्ण स्वस्थ रहता है। ​सिर दर्द (किसी भी प्रकार का) पूर्णत: ठीक हो जाता है। ​अँस्त्रें सुंदर, बड़ी, आकर्षक एवं निरोग हो जाएँगी ​चेहरा सुंदर, तेजवान व चमकदार हो जाता है। ​रक्त दोष दूर होता है। मुँह से निकलने वाली दुर्गन्ध का नाश होता है। ​शंख-प्रक्षालन की क्रिया के बाद आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध, ध्यान एवं कुण्डलिनी जागरण में विशेष लाभ मिलता है। ​यह क्रिया शरीर के लिए अद्भुत एवं अमृत के समान है। पुरुषत्व शक्ति में वृद्धि होती है। ​बावासीर एवं भगदर रोग में लाभ।

शख-प्रक्षालन में सावधानियाँ

​दूध एवं दूध से बनी सामग्री मिर्च मसाले खटाई तथा गरिष्ठ आहार का शंख प्रक्षालन के बाद एक हफ्ते तक प्रयोग वजित है। ​शंख-प्रक्षालन के बाद कुंजल क्रिया एवं जल नेति ज़रूर करें ताकि आपके मुख से लेकर उदर-प्रदेश एवं नाक तक की सफ़ाई हो जाए। ​शंख-प्रक्षालन के तुरंत बाद स्नान न करें/कम से कम उस दिन ठंडे जल से स्नान न करें। इस क्रिया के बाद आराम करें पर सोएं नहीं। ​अति मेहनत का काम न करें। ​एक हफ्ते तक हल्के व्यायाम करें। योगासन की जटिल क्रिया न करें। ​निम्नरक्तचाप उच्च रक्तचाप एवं मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति न करें। ​तीव्र उदर-विकार से ग्रसित व्यक्ति न करें। ​गर्भवती स्त्रियाँ न करें।

शंख प्रक्षालन क्रिया से अंदर आँतों में मल नहीं चिपक पाता। मल नहीं चिपकता तो रोगाणु नहीं पनप पाते, दुर्गधित वायु उत्पन्न नहीं हो पाती। आँतों के साफ़ होने से भूख ठीक ढंग से लगती है। पाचन-तंत्र हमारे आहार में से पूर्णत: विटामिन, प्रोटीन को खींच लेते हैं जिससे हमारे पूरे शरीर को उचित पोषण मिलता है। हमारा शरीर सुगठित होता है। हमारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है अत: बाहर के कीटाणु भी निष्क्रिय हो जाते हैं। हम पूर्णतः स्वस्थ हो जाते हैं। जिससे हमारा मस्तिष्क भी अच्छा कार्य करता है, स्मरण शक्ति तेज़ हो जाती है। आँखें निर्मल होती हैं। चेहरे पर तेज बढ़ जाता है। शरीर की वृद्धि उचित ढंग से होती है। रक्त विकार नहीं हो पाता। सुस्ती आदि आतरिक विकार उत्पन्न नहीं होते। वात, पित, कफ़ नहीं बन पाते अत: उनसे होने वाले रोग भी नहीं होते। इस प्रकार हम देखें तो शंख प्रक्षालन की क्रिया पूर्णत: वैज्ञानिक है जिसके लाभ हमें साक्षात् दृष्टिगोचर होते हैं। अतः हमें अपने जीवन में शंख प्रक्षालन की क्रिया कम से कम एक-दो बार करके उसकी अनुभूति अवश्य करनी चाहिए।

 

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