Eye Infection Symptoms :आंखो का संक्रमण एंव मोतियाबिंद के लक्षण

आंखे मनुष्य को ईश्वर का एक वरदान है। बिना आँखों के इस संसार में जीवन बड़ा कष्टमय हो जाता है। हमारे शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं जो हमें वाह्य जगत का बोध कराती है -नेत्र, कर्ण, जिह्वा, नासा व् त्वचा। नेत्र का स्थान सर्वोपरि है, जो हमारे उत्तमांग अर्थात शिर में स्थित है। चूँकि हमारे नेत्र अत्यंत कोमल होते हैं अतः इनमे मामूली सी लापरवाही के चलते अनेको रोग हो सकते हैं। आँखों के रोग होने पर व्यक्ति अक्सर परवाह नहीं करते हैं। कुछ रोगों के लक्षण धीरे-धीरे आना शुरू होते हैं और जब दिक्कत ज़्यादा बढ़ जाती है, तब चिकित्सक के पास भागते हैं। ऐसे समय में रोग या तो असाध्य हो जाता है या ऑपरेशन की ज़रूरत आन पड़ती है। विश्व भर में चार करोड़ से भी अधिक व्यक्ति नेत्रहीन हैं, जिन में से दो करोड़ व्यक्ति अकेले भारत में हैं। इस से भी बड़ी बात यह है कि हर साल यह संख्या बढ़ती ही जा रही है।

नेत्र के रोग – Eye Disease

नेत्र की व्याधियाँ विभिन्न प्रकार की हो सकती हैं। यहाँ उनमे से कुछ सामान्य रूप से मिलने वाली बीमारियों का उल्लेख किया जा रहा हैं।

1. दृष्टि दोष – visual impairments

रोगी की पास या दूर की नज़र कमज़ोर हो जाती है। ऐसे में पास या दूर की चीज़े धुंधली अस्पष्ट दिखती है। अमूमन इस समस्या का समाधान लेंस वाले चश्मे लगाने से हो जाता है। इस स्थिति में चाहिए कि नेत्र विशेषज्ञ के परामर्श से चश्मे का नंबर ले। कभी कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति के चश्मे का नंबर बड़ी तेजी से बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में तुरंत परामर्श लेना चाहिए, क्योंकि ऐसा संभव है कि आँखों में अंदर परदे या लेंस की कोई बड़ी बीमारी न हो रही हो।

2. आंखो का संक्रमण – Eye Infection

अक्सर देखने में आया है कि आँखों में विषाणु जनित कंजंक्टिवाइटिस हो जाती है। यह व्याधि संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से होती है। इसमें आँखों से लगातार पानी आना, आँखों का लाल पड़ जाना, आंखों में दर्द व् जलन का होना, प्रकाश में आने पर तेज चमक का महसूस होना आदि लक्षण होते हैं। यह बीमारी बच्चो में अधिक देखने को मिलती है। बच्चो में बुखार भी आ सकता है। इसमें अक्सर रोगी अपनी आंखे मलता है, जिससे आराम मिलता है | किन्तु इस तरह आँखे मलने से संक्रमण हाथो द्वारा दूसरी आंख में भी या दूसरे व्यक्ति हो हो जाता है। बार-बार हाथ धोने कि आदत से इस रोग का फैलाव रोका जा सकता है।

3. नेत्र में आघात होना

आँखों में कई प्रकार से आघात होकर ज़ख्म बन जाते हैं। यदि सही समय पर इसकी चिकित्सा न करवाई तो यही ज़ख्म अंधेपन का कारण भी हो सकते हैं। आँखों में किसी खर-पतवार के गिरने, कीड़े के पड़ जाने से, किसी रासायनिक पदार्थ के गिरने से, आतिशबाज़ी में निकली चिंगारी से, सड़क दुर्घटना में आँखों में आई किसी गंभीर चोट से, धूल के कण, भाप, कांच के कणो आदि से पुतली पर ज़ख्म या घाव बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में शीघ्र अति शीघ्र चिकित्सीय सहायता लेना चाहिए। आँखों को तुरंत साफ पानी के छीटें मारें। यदि कोई धूल आदि का कण चिपका हो, तो फूंक मार कर निकालने का प्रयास करें। कभी भी आँखों को मसलना या दबाना नहीं चाहिए। आँखों पर एक नरम पैड लगा कर पट्टी बांधे और तुरंत चिकित्सीय परामर्श हेतु संपर्क करें। दर्द होने कि स्थिति में ठन्डे पानी के छींटे या बर्फ द्वारा सिकाई करें।

4. मोतियाबिंद – Motiyabind

यह लगभग ४० वर्ष की आयु के बाद आँखों में होने वाला धुंधलापन का रोग है | इसे बोलचाल की भाषा में ‘सफ़ेद मोतिया’ भी कहते हैं | इस बीमारी में आँखों का लेंस अपारदर्शी होने लगता है। दृष्टि हीनता का यह एक प्रमुख कारण है। मधुमेह के रोगियों में और स्टेरॉयड लेने वाले लोगो में इसके मिलने की संभावना अधिक होती है। शुरू शुरू में नज़र बहुत अधिक कमज़ोर नहीं होती। थोड़े दिन में जब लेंस का पदार्थ पूरी तरह से गदला हो जाता है, तब व्यक्ति चीज़ो को साफ नहीं दिखाई देती। मोतियाबिंद होने के अन्य कारण सूर्य की पराबैंगनी किरणे, अधिक दृष्टि दोष का होना, मधुमेह. उच्च रक्तचाप, मोटापा, धूम्रपान, मदिरा सेवन, स्टेरॉयड औषधियां, कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाई, हॉर्मोन नियंत्रण की दवाई, आँखों की चोट या कोई ऑपरेशन, आदि हो सकते हैं | हमारी आंख का लेंस एक प्रकार के प्रोटीन से बना होता है। लेंस कि धूमलता का कारण आहार में पोषक तत्वों कि कमी होना हो सकता है | हमारे भोजन में एंटी ऑक्सीडेंट युक्त पदार्थ लेने से मोतियाबिंद से बचाव हो सकता है। विटामिन ई, कैरोटिनॉइड, ज़ैंथीन, ल्यूटिन, ओमेगा ३ फैटी एसिड आदि वाले आहार लाभ दे सकते हैं | सूरजमुखी के बीज, बादाम, पालक, केले, हरी सब्जियां, संतरे, पीले फलों आदि में ये सब तत्व प्रचुर मात्रा में मिलते हैं | कम दिखाई देने की अवस्था में बाइफोकल लेंस के चश्मे का प्रयोग करना चाहिए। बारीक़ काम करते समय या पढ़ते समय उचित प्रकाश होना चाहिए। यदि लेंस कि अपारदर्शिता अत्यधिक बढ़ जाये तो ऑपरेशन के द्वारा ख़राब हो चुके लेंस को हटाकर कृत्रिम लेंस लगाया जाता है।

5. काला मोतिया की समस्या – glaucoma problem

आँखों में काला मोतिया या ग्लूकोमा की बीमारी आंख के भीतर का प्रेशर या दबाव बढ़ने से होती हैं। इसकी शुरुआत सर में होने वाली असहनीय पीड़ा से होती हैं। आँखों में दर्द तथा पानी आना मुख्य समस्या होती हैं। आँखों में दबाव के अधिक बढ़ने से धीरे धीरे नज़र कमज़ोर भी हो जाती हैं। समय रहते जाँच एवं इलाज करवाने से यह ठीक हो सकता हैं। कुछ रोगियों में ऑपरेशन की भी जरुरत पद सकती हैं।

6. रेटिना या परदे की बीमारियां – retinal diseases

लेंस द्वारा प्रकाश की किरणे हमारे रेटिना यानी आंख के परदे पर पड़ती हैं, जिससे हमें उनका चित्र दिखाई देता है। कुछ बीमारियों की अवस्था में आंख का रेटिना ही ख़राब होने लगता है। जिस कारण से देखने में कठिनाई होती है। मधुमेह व् उच्च रक्तचाप वाले रोगियों में इसकी संभावनाए अधिक होती हैं | इसीलिए इन रोगियों को नियमित रूप से परदे की जाँच करना चाहिए। समय रहते लेज़र ऑपरेशन से नज़र बच सकती है।

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