मिट्टी द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा आधारभूत तत्त्व – Natural Theraphy

परम पिता परमात्मा ने पाँच तत्त्वों के संगठन से प्रकृति की रचना की है और प्रकृति ने इन्हीं पाँच तत्त्वों द्वारा अपनी सर्वश्रेष्ठ कृति मानव शरीर को गढ़ा है। इन पाँच तत्त्वों को पंच-महाभूत कहते हैं। ये पंच-महाभूत हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। इन पंच-महाभूतों और इनके द्वारा सभी जीवधारियों की शरीर रचना के तथ्य को महाकवि तुलसीदास ने निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया है— छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम सरीरा॥ शरीर की रचना करनेवाले पाँच महाभूतों में सबसे पहला तत्त्व है—पृथ्वी, जिसे हम मोटे तौर पर मिट्टी कहते हैं।

मिट्टी तत्त्व

मिट्टी तत्त्व ठोस है, भारी है, स्थूल है। अतः हमारे शरीर में जो कुछ ठोस, भारी और स्थूल है, वह सब मिट्टी तत्त्व द्वारा ही बना है। अस्थियाँ, मांस, त्वचा, बाल आदि मिट्टी तत्त्व से ही बने हैं। यहाँ तक कि शरीर को पोषित करनेवाली सभी धातुओं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र तथा इन्हें धारण करने वाले अंग मिट्टी तत्त्व द्वारा ही बनते हैं और इसी के द्वारा पोषित होते हैं। ठोस, स्थूल और भारी होने के कारण मिट्टी तत्त्व रूप और आकार ग्रहण करता है। अतः हम यह भी कह सकते हैं कि शरीर में जो भी रूप और आकार है, वह सभी कुछ मिट्टी तत्त्व द्वारा ही रचित है। शरीर के अंगों की बनावट, लंबाई-चौड़ाई और भार सभी कुछ इसी तत्त्व की देन है।

मिट्टी की प्रकृति और गुण

मिट्टी साधारणतः देखने पर स्थूल दिखाई देती है, किंतु प्रकृति ने मिट्टी की प्रकृति में बड़े गुण सहेजकर रखे हैं। मिट्टी का सबसे महत्त्वपूर्ण गुण है सर्जनशीलता। यदि आप एक ही स्थान की मिट्टी में थोड़ी-थोड़ी दूर पर गुलाब, बेला, चमेली, गुड़हल, आम, अमरूद, नीम, नींबू या गेहूँ, चना, जौ, मटर आदि उगा दें तो आप पाएँगे कि बेला अपनी खुशबू दे रहा है और गुलाब अपनी, आम अपना फल दे रहा है और नीम अपनी निबोली। उसी मिट्टी में गेहूँ हो रहा है और वही मिट्टी चना एवं मटर पैदा कर रही है। अर्थात् मिट्टी किसी भी बीज के मूल गुण को नहीं छीनती है। जितना अधिक-से-अधिक संभव हो, वह उस बीज के गुण को निखारती है, बढ़ाती है। ऐसा कभी नहीं होता कि मिट्टी अपनी ओर से पास-पास लगे आम और नीम के पेड़ में एक-दूसरे का स्वाद घोल दे, आम को कड़वा और निबोली को आम की तरह मीठा कर दे। यह है मिट्टी की ईमानदारी, जिसपर आप पूरा विश्वास कर सकते हैं।

मिट्टी की दूसरी बड़ी विशेषता है विष को मारना या समाप्त करना और उसे लाभदायक बनाकर प्रस्तुत कर देना। मरा हुआ पशु दूर तक अपनी दुर्गंध बिखेरता है और रोग के विषाणुओं को फैलाता है, किंतु उसे यदि हम मिट्टी में दबा दें तो कुछ ही दिनों में मिट्टी उसे सड़ा-गलाकर न केवल विषैलेपन और दुर्गंध को समाप्त कर देती है अपितु उसे लाभकारी खाद में बदल देती है। मिट्टी हमारा सर्जन करती है, रूप-सौंदर्य को निखारती है, शारीरिक विकास करती है और रोगों से हमारी रक्षा करती है। इस प्रकार प्रकृति में सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक का कार्य करती है मिट्टी। आपको विश्वास होना चाहिए कि मिट्टी से बड़ा चिकित्सक विश्व भर में आपको ढूँढे़ नहीं मिलेगा।

स्वास्थ्य-वर्द्धन हेतु मिट्टी पर नंगे पाँव टहलना

बलुई, रेतीली, तालाब, समुद्र या नदी किनारे की शीतल मिट्टी या फिर खेत या हरे-भरे मैदान की उपजाऊ दोमट मिट्टी पर प्रातः-सायं नंगे पैर टहलने से मस्तिष्क के विकारों का शमन होता है; दिमाग की गरमी शांत होती है। शीतल और शांत मस्तिष्क शरीर के सभी अंगों पर नियंत्रण रखने तथा उन्हें क्रियाशील बनाए रखने के लिए नई ऊर्जा से भर जाता है। तात्त्विक दृष्टि से अग्नि तत्त्व शरीर में तेज का सृजन करता है तथा विकार- ग्रस्त होने पर गरमी बढ़ा देता है। तेज तत्त्व को ग्रहण करनेवाली इंद्रिय नेत्र है तथा शरीर में बढ़ी हुई गरमी को बाहर निकालनेवाले अंग पाँव हैं। अतः स्वच्छ एवं शीतल मिट्टी पर टहलने से शरीर की अतिरिक्त गरमी पैर के तलवों के माध्यम से मिट्टी खींच लेती है और शरीर को शीतलता भेंट कर देती है। इसका सर्वाधिक लाभ नेत्रों को मिलता है।

नेत्रों की गरमी दूर होकर विकार समाप्त हो जाते हैं और उनकी क्रियाशीलता बढ़ जाती है। इस प्रकार, मिट्टी पर टहलने से रक्त का संचार नियमित होता है; रक्त की गरमी दूर होती है; मस्तिष्क और नेत्र के विकार शांत होते हैं; मन स्फूर्ति और प्रसन्नता का अनुभव करता है तथा नेत्रों की ज्योति बढ़ती है।

मिट्टी के बिस्तर पर सोना

पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से आप भली प्रकार परिचित हैं। प्रत्येक ठोस या भारी वस्तु को पृथ्वी अपनी ओर खींचती है। या यों कहें कि अपने अंश के प्रति पृथ्वी में एक प्रबल आकर्षण होता है; खासकर जलीय और ठोस पदार्थों के प्रति यह आकर्षण सर्वाधिक होता है। हमारे पंच-महाभूतात्मक शरीर का संपूर्ण स्थूल भाग—रक्त, अस्थि, मांस आदि पृथ्वी तत्त्व से ही बना है। अतः शरीर के प्रति पृथ्वी का आकर्षण स्वाभाविक है। शरीर के प्रति पृथ्वी के इस आकर्षण में पृथ्वी का ममत्व छिपा है। पृथ्वी अपने अंश को अपनी ओर आकर्षित करके उसे पुष्ट करती है। शरीर के स्थूल अंग जैसे-जैसे पुष्ट होते हैं, उनमें स्वतः ही शक्ति का संचार होता है और यह शक्ति शरीर में स्थित तीन अन्य पंच-महाभूतों—अग्नि, वायु और आकाश तत्त्व को समृद्ध करती है। इससे व्यक्ति के शरीर में तेज गति और सोचने-विचारने की शक्ति बढ़ती है। आपने देखा होगा कि नन्हा शिशु अधिकांश समय लेटकर या सोकर गुजारता है और दूध आदि पदार्थों से शरीर को पुष्ट करता है।

मिट्टी चिकित्सा के लाभ

मिट्टी के बिछौने पर सोने से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति न्यून हो जाती है, जिससे सुखपूर्वक गहरी नींद आती है। मिट्टी के संपर्क में रहने पर शरीर के विकारों को मिट्टी सोख लेती है। मिट्टी शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे शरीर में नई शक्ति, स्फूर्ति और ताजगी अनुभव होती है। पृथ्वी तत्त्व के शक्तिशाली होते ही शरीर के अग्नि, वायु और आकाश तत्त्व भी विकारमुक्त तथा शक्तिशाली बन जाते हैं; इससे मस्तिष्क में प्रतिस्पर्धा, द्वंद्व, क्रोध, हिंसा आदि के विकार दूर होते हैं, यह शांत होता है तथा जागने पर नई ऊर्जा से संपन्न हो जाता है। इस प्रकार मिट्टी का बिस्तर न केवल शारीरिक और मानसिक विकारों का शमन करता है, अपितु उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक गु़णकारी भी है। संपूर्ण शरीर में गीली मिट्टी का लेप संपूर्ण शरीर में गीली मिट्टी का लेप करने के लिए सबसे पहले किसी स्वच्छ स्थान से मिट्टी लें। इस मिट्टी को कूट-पीसकर बारीक कर लें और इसमें से कंकड़-पत्थर आदि छानकर निकाल दें। अब इस मिट्टी में पानी मिलाकर रख दें। लगभग बारह घंटे तक भीगने के बाद मिट्टी को कलछी आदि से भली प्रकार घोट लें।

मिट्टी में पानी सिर्फ इतना ही डालें कि यह शरीर पर लगाने पर बहे नहीं और न ही अधिक गाढ़ी या कड़ी रहे, जिस स्थान पर भी इसका लेप करना चाहें उस स्थान पर भली प्रकार चिपक जाए। हाथ से छूने पर ऐसी मिट्टी मक्खन की तरह मुलायम और रोटी बनानेवाले आटे की तरह गीली होनी चाहिए। लगाने की विधि अब इस मिट्टी को शरीर के सभी अंगों में एक पतली परत के रूप में लगाएँ। शरीर का कोई भी अंग अछूता नहीं रहना चाहिए। मिट्टी की परत चढ़ाने के बाद ऐसे स्थान पर बैठें जहाँ तेज हवा न लगे, किंतु सूर्य की रोशनी पूरे शरीर पर पड़े। धूप में मिट्टी धीमे-धीमे सूख जाएगी। यदि मिट्टी जल्दी सूख जाए तो एक परत और चढ़ा सकते हैं। लगभग आधा घंटे के धूप स्नान के बाद मिट्टी की यह परत सूख जाएगी। कुछ और समय तक धूप में बैठने पर मिट्टी की परत पूरी तरह सूखकर दरक जाएगी और शरीर से छूटने लगेगी।

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