आयुर्वेद चिकित्सा द्वारा पाचक अग्नि को कैसे दुरुस्त करे ?

पाचक अग्नि को दुरुस्त करना आयुर्वेद चिकित्सा ग्रंथों में असंतुलित पाचक अग्नि को संतुलित अवस्था में लाने तथा उसमें सुधार के लिए बहुत से उपाय बताए हैं। इनसे न केवल भूख बढ़ती है, बल्कि पाचक अग्नि को सामान्य करने में भी मदद मिलती है, जिससे अमा सामान्य हो जाता है। कुछ खाद्य पदार्थ, जड़ी बूटियाँ तथा मसाले अनि को सामान्य अवस्था में लाने के लिए उपयुक्त हैं

पाचक अग्नि कोदुरुस्त करने का तरीका

अदरक: एक महत्त्वपूर्ण पाचक है। सूखा अदरक, जिसे सोंठ कहते हैं। अदरक का एक छोटा टुकड़ा पीसकर दो कप पानी में मिलाएं। इसमें एक चुटकी धनिया मिलाकरएक कप होने तक उबालें। इसे दिन में दो बार हलका गरम ही सेवन करें। यह भोजन से पहले या बाद में लिया जाना चाहिए। इसका सेवन रोज न करें। इसे चाय के रूप में भी तैयार किया जा सकता है। सब्जियाँ बनाने, केक इत्यादि में भी अदरक का इस्तेमाल कर सकते हैं। वात प्रकृति के लोग अदरक को नमक के साथ ले सकते हैंपरंतु पित्त प्रकृति के लोगों में अधिक अदरक का इस्तेमाल शरीर में पित्त को उत्तेजित कर सकता है। अधिक लाभ के लिए अदरक के साथ जीरे का उपयोग भी किया जा सकता है। कफ प्रकृति के लोगों के लिए अदरक की चाय उपयुक्त है, इसे ठंडा करके उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। शहद अधिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार यदि अदरक का इस्तेमाल अधिक किया जाए तो वह पेट तथा प्रास नली में जलन उत्पन्न कर सकता है। यदि यह उपचार राहत न दे तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

घी: पित्त वृद्धि या असंतुलन के लिए सर्वोत्तम उपचार है। गाय के दूध से बना घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, क्योंकि यह खून में कोलेस्टरोल नहीं बढ़ाता तथा वात को शांत करता है परंतु यह कफ प्रकृति के लोगों के लिए अच्छा नहीं है। इसलिए कड़वी तथा तीखी औषधियों को मिलाने के बाद इसे इस्तेमाल में लाना चाहिए। घी को खाना पकाने के लिए तेल की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर के लिए नुकसानदायक है। पाचक अग्नि तथा तीता भोजन आयुर्वेद में बहुत से मसाले और जड़ी-बूटियाँ है, जिन्हें असंतुलित अग्नि को सामान्य अवस्था में लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन इन चीजों को पित्त प्रकार के अपच में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये पित्त को उत्तेजित करते हैं

चित्रक: की जड़ का सत फार्मेसियों में उपलब्ध होता है। उसे भोजन के बाद दूध या मट्ठा में न्यूनतम मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है। अग्नि को संतुलित करने के लिए कालीमिर्च के चूर्ण का सेवन किया जाता है। कड़वी चीजें, जैसे करेला अग्नि को बढ़ाने तथा अमा को साफ करने में पूर्णतः सक्षम है। अग्नि को संतुलित तथा अमा को साफ करने के लिए अदरक, लौंग, कालीमिर्च तथा दालचीनी का प्रयोग किया जाता है। हमारे देश में भोजन के बाद चुटकी भर सेंधा नमक के साथ सौंफ चबाने का रिवाज है। यह अग्नि को उत्तेजित करके उसे संतुलित करती है। खुशनुमा आहार हमारे जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है प्रसन्नता। व्यक्ति को स्वस्थ तथा प्रसन्न बनाने के लिए आयुर्वेद में बहुत से उपाय दिए गए हैं। जब हम भोजन करते हैं तो वह सूक्ष्म स्तर पर बहुत से परिवर्तनों से गुजरकर ऊतकों तथा अंततः हमारे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचता है। भोजन का अंतिम परिणाम ओजस है, जो भोजन का रस है। यह शरीर को बल तथा तेज देता है। शरीर तथा मन, दोनों के संतुलन के लिए यह आवश्यक है। असंतुलित एवं असंयमित भोजन के कारण मानसिक विकार, चिंता, अवसाद आदि उत्पन्न होते हैं।

सात्त्विक आहार: आहार तीन प्रकार के होते हैं सात्त्विक,राजसिक तथा तामसिक। यहाँ सात्त्विक आहार का विवरण दिया गया है। जन्म से मृत्यु तक सात्विक आहार का सेवन करना चाहिए। सात्त्विक आहार में मुख्य रूप से दूध तथा उससे बने पदार्थ (घी,मक्खन), चावल, तिल, फल, फलों का रस और सभी प्रकार के मीठे पदार्थ शामिल हैं। सात्त्विक आहार के विशिष्ट होने की जरूरत नहीं है, परंतु उसमें नियंत्रित मात्रा में शुद्ध जल के साथ छहों स्वादों का संतुलन, ताजगी एवं हलकापन होना चाहिए। ऐसा भोजन अच्छा स्वास्थ्य तथा दीर्घ आयु प्राप्त करने में मन तथा शरीर के लिए स्वास्थ्यकर होता है। दैनिक आहार में सामान्य भोजन, जैसे-चावल, सब्जियाँ, फल, दूध आदि लेना सर्वोत्तम रहता है। कई बीमारियों, मोटापा तथा हृदय रोगों में भी सात्विक आहार लेने की सलाह दी जाती है। दूध युवाओं तथा वयस्कों के लिए दूध अति उपयोगी है। गाय का दूध सर्वोत्तम होता है, क्योंकि वह सात्त्विक होता है। दूध में एक-चौथाई पानी मिलाकर उबालना चाहिए। ठंडे

 

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