पाचक अग्नि और पाचन तंत्र को उत्तेजित कैसे करें, और लक्षण

यदि उपयुक्त मात्रा में और उचित समय पर संतुलित भोजन किया जाए तो कोई बीमार न पड़े। परंतु ऐसा नहीं किया जाता है और फिर गैस्ट्रिक अल्सर, आँत का अल्सर तथा पेप्टिक अल्सर जैसे रोगों की संभावना बढ़ जाती है। आयुर्वेद में पाचन तंत्र को काफी महत्त्व दिया गया है। जब पाचन सही होता है तो कोशिकाओं समेत शरीर के सभी ऊतक पर्याप्त पोषण प्राप्त करते हैं और शरीर के विकास में मदद करते हैं।

पाचकअग्नि को उत्तेजित कैसे करें

आयुर्वेद के अनुसार अग्नि की गतिविधियाँ लयबद्ध होती हैं। उस लय का पालन करना तथा उचित समय पर उचित मात्रा में भोजन करना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो यह अग्नि में असंतुलन को पैदा करता है और रोगों को जन्म देता है। ग्रामीण लोग भोजन में परिवर्तन के प्रति उन्मुख नहीं होते हैं, इसलिए उन्हें अग्नि असंतुलन तथा इससे संबंधित बीमारियों की कोई शिकायत नहीं होती है। शहरों में रहनेवाले लोगों की तुलना में यह उत्तम तथा प्रशंसनीय है। जब भोजन अनुचित समय पर किया जाता है तो पाचन और क्षुधा में गड़बड़ियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे निम्नलिखित लक्षण पैदा होते हैं-भूख की कमी, कब्ज या डायरिया, कलेजे में जलन (हाइपर एसिडिटी या अति अम्लता), पेट में जलन, वजन सामान्य से कम या अधिक, संग्रहणी रोग (पाचक रोग), अल्सर, इरिटेबल कोलोन सिंड्रोम, कोलाइटिस (शोध) तथा पेटदर्द। यदि उपर्युक्त लक्षण उभरते हैं तो 15 दिनों में एक बार पाचकाग्नि को पुनर्व्यवस्थित करना आवश्यक होता है। कफ प्रकृति में अग्नि को 7 दिनों में एक बार पुनर्व्यवस्थित करने की
जरूरत होती है। यदि किसी को शोथ, डायरिया (दस्त), पेचिश (डिसेंटरी) तथा अल्सर है तो चिकित्सक के परामर्श के बिना अग्नि को पुनर्व्यवस्थित न करें। हलका आहार लेना तथा सोते समय गरम पानी में अरंडी के तेल के साथ दस्तावर लेना अच्छा रहता है। यह पेट तथा आँत में अल्सरवाले रोगियों को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यदि यह
उन्हें दिया ही जाता है तो तेल में दूध मिलाना चाहिए। अगले दिन उपवास करना तथा पूरे दिन तरल पदार्थ लेना ही बेहतर होगा। वात तथा पित्त प्रकृति के लोगों को चाहिए कि फलों के रस को गरम पानी साथ मिलाकर ले। यह पूरे दिन लेनाउचित होगा।

कफ प्रकृति के लोगों को केवल गरम पानी पीना चाहिए। उन्हें केवल आराम करना चाहिए। हलका आहार लेना उनके लिए उत्तम है, क्योंकि यह शरीर के लिए स्वास्थ्यकर है। तीसरे दिन हलका नाश्ता लेना तथा दोपहर के हलके भोजन तथा रात्रि भोजन के बीच गरम पानी पीना अच्छा रहता है। शराब तथा अन्य सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए। यदि आप चाय पीना चाहते हैं, तो अदरक की चाय या जीरा पाउडर के साथ धनिए की चाय लेना लाभकर है। भोजन के बाद गरम पानी पीएं, जो पाचक होता है तथा भूख को बढ़ाता है। दो समय के भोजन के बीच गरम पानी या अदरक की चाय या धनिया की चाय के अलावा कुछ न लें। भोजन में सब्जियाँ, दाल तथा चावल होना चाहिए। यह सभी प्रकार के वात, पित्त तथा कफ व्यक्तियों के लिए उपयुक्त होता है। अब पाचक अग्नि पुनर्व्यवस्थित हो चुकी है तथा सामान्य आहार को पचाने के लिए तैयार है। पाचन प्रणाली को दुरुस्त करने तथा शरीर को रोगों से मुक्त रखने के लिए कच्ची सब्जियाँ खाना अच्छा रहता है। कॉफी, शराब तथा नमक से परहेज करना चाहिए। कॉफी केंद्रीय स्नायुतंत्र को उत्तेजित करती है, यह सभी अंगों को उत्तेजित करके अस्थायी सक्रियता प्रदान करती है, परंतु बाद में थकान पैदा करती है। यही काम शराब भी करती है। अधिक नमक युक्त भोजन अधिक तरलता को प्रेरित करता है, जिससे अधिक वजन और उच्च रक्तचाप की शिकायत हो सकती है। बाद में यह हृदयाघात को भी जन्म दे सकता है।

संतुलित पाचक अग्नि के लक्षण

1. यह शरीर को रंगत प्रदान करती है
2. व्यायाम के प्रति सहनशक्ति
3. अच्छा स्वास्थ्य
4. वजन ढोने की क्षमता
5. कठिन परिश्रम करने के लिए तैयार
6. मजबूत तथा परिश्रमी शरीर
7. सभी प्रकार का भोजन पचाने की क्षमता
8. चमकीली रंगत
9. चमकीली आँखें
10. साफ मूत्र विसर्जन
11. बिना किसी दुर्गंध के सामान्य रूप से मल त्याग
12. कब्ज तथा दस्त की शिकायत नहीं।

 

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