दैनिक जीवन में प्रार्थना की उपयोगिता व महत्त्व: Prarthna

मानव जीवन में प्रार्थना का बड़ा महत्त्व है। प्रार्थना की विभिन्न परिस्थितियाँ। जहाँ एक ओर संबल प्रदान करती हैं, वहीं दूसरी ओर भय मुक्त भी करती हैं। प्रार्थना जहाँ हमें जीवन जीने हेतु आधार प्रदान करती है वहीं हमारे पूरे व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है। प्रार्थना से आध्यात्मिक पक्ष को बल एवं शक्ति प्राप्त होती है, जिसमें तनाव, द्वन्द्वों तथा विपरीत परिस्थितियों में हम अनुकूलन करना सीख जाते हैं। सतत् प्रार्थना के प्रभाव से रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ने लग जाती है तथा दूसरी ओर रोगों का प्रकोप भी कम होने लगता है, इसके परिणाम स्वरूप बीमारियों को दूर करने में बहुत मदद मिलती है। स्पष्ट है कि सतत् प्रार्थना से स्वरूप के तीनों पक्ष सबल बनते हैं और सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।

प्रार्थना की उपयोगिता व महत्त्व

1. सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति का साधन

मानवीय सम्पूर्ण स्वास्थ्य के तीन पक्ष हैं। प्रथम पक्ष शारीरिक पक्ष है जो स्थूल है। द्वितीय पक्ष मानसिक है जो सूक्ष्म है तथा तृतीय पक्ष आध्यात्मिक है जो आत्मा से सम्बंधित है। इन तीनों पक्षों में एक गहरा पारंपरिक सम्बंध और तालमेल है। प्रार्थना के अभाव में आध्यात्मिक पक्ष की निरंतर अवहेलना होती जाती है। इसके परिणाम स्वरूप आत्मीय पक्ष दु:खों से भर जाता है और तत्पश्चात् मन अशांत, अस्थिर और क्लेश युक्त हो जाता है। ऐसी स्थिति लंबे समय तक जारी रहने से अनेक प्रकार के मनोरोग जैसे दुश्चिंता, अकारण भय, मानसिक अवसाद उत्पन्न होते हैं। इसके पश्चात् इन मनोरोगों के कारण उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, पेट की बीमारियाँ जैसे वायुविकार, हिस्टीरिया आदि मनोकायिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

2. आत्म-शोधन का साधन

प्रार्थना का हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है ‘आत्मोन्नति”। पहले साधक अपने द्वारा किए गए पापों का पश्चाताप करता है और पापाचार को पुनः न करने का संकल्प लेता है। प्रार्थना साधक के जीवन में एक कर्तव्य परायण नियमित प्रहरी की तरह होती है जो चोरों एवं समाज विरोधी तत्वों को घर के पास आने से रोकती है। बार-बार प्रार्थना करने से साधक को बार-बार आत्म निरीक्षण का अवसर मिलता है जिससे वह दो प्रार्थनाओं की मध्यावधि में मन, वचन एवं कर्म से होने वाले स्खलनों को जान जाता है। इस प्रकार ध्यान में बैठ जाने पर प्रार्थना का स्थान पश्चाताप ले लेता है और साधक पुनः अपराध न करने का निश्चय करता है। जिस प्रकार स्नान व शोधक औषधियाँ हमारे शरीर को बाहूय एवं आंतरिक शुद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार प्रार्थना भी आत्म-शोधन का साधन है।

3. अध्यात्मिक सामथ्र्य की प्राप्ति का साधन

प्रार्थना न केवल शोधन का कार्य करती है अपितु हमें आध्यात्मिक सामर्थ्य भी प्रदान करती है। सतत् प्रार्थना से मन की चंचलता समाप्त होने लगती है और मन स्थिरता को प्राप्त होता है। चित्त की वृत्तियों पर साधक का नियंत्रण हो जाता है। निरंतर नियमित प्रार्थना से मानसिक एकाग्रता का स्तर भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है और फिर क्षुद्र अहम् का विनाश हो जाता है। इस प्रकार साधक को प्रार्थना ऐसे ऊँचे स्तर तक ले जाती है जहाँ साधक को ईश्वर को सर्वव्यापकता की अनुभूति होती है और साधक का अनंत से संपर्क संस्थापन होता है।

4. केकैवल्य प्राप्ति का साधन

सतत् प्रार्थना के प्रभाव से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त हो जाता है। चित्त और मन में संयम के साथ-साथ प्रार्थना से ऐसा रक्षा कवच प्राप्त होता है जो ध्यानादि के उच्च अभ्यास के समय सांसारिक प्रलोभनों से साधक के समीप पहुँचने पर साधक के मन में आध्यात्मिक सफलता का गर्व जागृत कर सकता है। ऐसी स्थिति में प्रार्थना से मन में उत्पन्न हुए इस अहम् और गर्व आदि को विनष्ट किया जा सकता है। हमारे सामाजिक परिदृश्य में ऐसे कई महापुरुषों के उदाहरण हैं जिन्होंने प्रार्थना के द्वारा कठिन से कठिन समय में, अत्यधिक दु:खों में रहते हुए भी जीवन में सामंजस्य कर दिखाया। ईसा मसीह द्वारा अपने अंतिम समय में अत्याचारियों के कल्याणार्थ प्रार्थना करके शारीरिक घोर कष्टों से मुक्ति पाई और ईश्वर के सर्वव्यापी होने की सिद्ध किया। महात्मा गाँधी ने प्रार्थना के बल पर ही अहिंसा और सत्य को आधार बनाकर देश को आज़ादी दिलाने में अहम् भूमिका निभाई। कैवल्य प्राप्ति के लिए निग्रन्थ संत होना और आत्मा का चिंतन, मनन या निर्विकल्प ध्यान आवश्यक है। आज के वैज्ञानिक युग में प्रार्थना की उपयोगिता पर गंभीरता से विचार करें तो हम पाएँगे कि आज प्रार्थना अनेकानेक बीमारियों को दूर करने में औषधि के रूप में प्रयोग की जा रही है।

समाज में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाने, परिवार व समाज के आदेशों एवं मूल्य से तादात्म्य बनाने तथा स्वयं अपनी इच्छापूर्ति में विफल होने इत्यादि अवसरों पर तनाव उत्पन्न हो जाता है। तनाव का अर्थ मनोविज्ञान में तनाव शब्द का उपयोग कारण तथा प्रभाव के संदर्भ में किया जाता है। मानसिक तनाव के कारण के रूप में प्रतिबल तनाव का सम्बंध प्रतिबलक से है अर्थात् वह घटना या कारण जो मानसिक परेशानी उत्पन्न करता है। यह प्रतिबलक शारीरिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक होते हैं। जैसे-थकान, पीड़ा, बीमारी इत्यादि शारीरिक प्रतिबलक हैं। सामाजिक प्रतिबलक के अंतर्गत मानसिक गड़बड़ी के सामाजिक कारकों को लिया जाता है यथा गरीबी, बेरोज़गारी, छुआछूत आदि। मनोवैज्ञानिक प्रतिबलक का अर्थ वे घटनाएँ हैं जो व्यक्ति में मानसिक वैषम्यावस्था उत्पन्न कर देती हैं। जैसे-नौकरी छूट जाना, किसी प्रियजन की मृत्यु, वैवाहिक झगड़े इत्यादि।

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