नाभि/धरण हटने के मुख्य कारण एंव उससे होने वाले रोग ?

नामि विज्ञान परीक्षण मानव को स्वास्थ्य प्रदान करने में मुख्य योगदान प्रदान करता है। आयुर्वेदाचार्यों के मतानुसार नाभि-चक्र यदि अपने केंद्र स्थान से हट जाए (सरक जाए या पलट जाए) तो कई प्रकार के रोगों को पैदा कर सकता है। नाभि-चक्र के अपने स्थान से खिसक जाने पर उदर में अवस्थित मणिपूरक चक्र के सभी अंग कई प्रकार की व्याधियों से पीड़ित हो जाते हैं। अत: सम्पूर्ण शरीर को पूर्ण तंदुरुस्त रखने के लिए नाभि का अपने स्थान पर होना अति आवश्यक है।

नाभि हटने के प्रमुख कारण

कई लोग हमेशा नाभि-चक्र हटने से परेशान रहते हैं या कई लोगों को मालूम ही नहीं रहता कि उनका नाभि-चक्र अव्यवस्थित है और वे पूरी उम्र उनसे होने वाले रोगों को लेकर चिंतित रहते हैं। नाभि के हटने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे अचानक किसी वज़नदार वस्तु को उठाना, पैरों की चलते समय स्थिति बिगड़ जाना, उछलना-कूदना, भागना, सोते समय से अचानक सीधे उठ जाना, एक हाथ से अधिक वज़न उठाना, मल-मूत्र के वेगों को रोकना, उदर-प्रदेश को बगैर जानकारी के बलपूर्वक मलने से, उदर की किसी पुरानी बीमारी के कारण, भूख-प्यास को रोकना, सोने और उठने के क्रम में अनिश्चितता, मानसिक विकार जैसे भय, अधिक चिंता, क्रोध की अधिकता। अशुद्ध भोजन या वायु उत्पन्न करने वाला भोजन करने से, आहार की अधिकता, छींक या जम्हाई को रोकना, अपान-वायु को निकलने से रोकना, ठीक ढंग से योग की क्रियाओं को न करना आदि अनेक कारणों से नाभि अपने स्थान से हट जाती है।

नाभि हटने से उत्पन्न होने वाले रोग

यदि नाभि-स्पंदन अपने स्थान से हट जाए तो कई प्रकार लक्षण और रोग होने लगते हैं। क़ब्ज़ हो जाता है, मल रुक जाता है या बहुत कम मल त्याग होता है या बार-बार मल कम मात्रा में निकलता है, आँतों में मल चिपक जाता है जिस कारण वायु-विकार की संभावना अधिक बनी रहती है। नेत्र-विकार, बालों का झड़ना या असमय सफ़ेद होना, दुबलापन, वीर्य-विकार, मुँह से बदबू आना, रक्तविकार तथा हृदय विकार आदि।

नाभि ठीक करने वाले योगासन

नाभि चक्र ठीक करने के लिए निम्नलिखित आसन अधिक उपयोगी व लाभकारी माने जाते हैं जैसे – सुप्तवज्रासन, पश्चिमोत्तानासन, उष्ट्रासन, चक्रासन, धनुरासन, नौकासन, हलासन, उत्तानपादासन आदि। आयुर्वेद में नाभि-चक्र ठीक करने के लिए कई प्रकार की जड़ी-बूटियाँ भी उपयोग में लाई जाती हैं। – किसी आयुर्वेद के डॉक्टर से परामर्श लें। प्रात:काल खाली पेट लगभग दस ग्राम सौंफ़ और इतना ही गुड़ मिलाकर प्रतिदिन (स्वस्थ होने तक) अच्छे से चबाकर खाएँ। नाभि अपने स्थान पर आ जाती है। निर्गुण्डी का पता पेट पर बाँधने से लाभ मिलता है। आक के पके हुए पत्तों में अरण्डी का तेल लगाकर आग में सेंक कर गर्म-गर्म पेट की सिकाई करें और पेट पर बाँध लें। इससे नाभि चक्र ठीक होकर पेट के अंदर की सभी प्रकार की सूजन को मिटाता हैं। अतिसार रोग के लिए बरगद का दूध नाभि में भरने से बच्चों के दस्त के लिए लाभकारी है।

टमाटर के बीच में से दो टुकड़े करें और उसके बीज वाला भाग निकाल देवें और उसमें भुना हुआ सुहागा 9 रक्ती भर देवें और आँच पर गर्म करके चूसने से नाभि चक्र अपने स्थान पर आ जाता है। बहेड़े के फल की मज्जा का क्वाथ बना लें और 1-1 घंटे से पिलाएँ तो नाभि चक्र और अतिसार ठीक होते हैं। हमारे वेद-पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में नाभि के महत्व को दर्शाया गया है। आज इस संदर्भ में पूर्ण जानकारी न होने के कारण अनजाने में हम अपना इलाज उचित ढंग से नहीं करा पाते और कई प्रकार के रोगों से घिर जाते हैं। अत: इस तरफ़ हम अपना ध्यान एकाग्र करें तो हमको बेहतर लाभ प्राप्त होगा। यह विषय बहुत बड़ा है। किसी आयुर्वेद के डॉक्टर से परामर्श लें। स्थानाभाव के कारण हम यहाँ विराम देते हैं।

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