ईश्वर के प्रति आत्म निवेदन प्रार्थना का अर्थ और उसके प्रकार : Prayer

पूर्ण श्रद्धा भक्ति और विश्वास के साथ ईश्वर चरणों में स्वयं को समर्पित करना ही प्रार्थना है। सच्ची प्रार्थना वही है जिसमें हम अपनी विराट् सत्ता के प्रवाह में अपने क्षुद्र अहम् का शमन करते हैं। हम अपने आंतरिक प्रकाश को विश्व में बिखेरते हुए प्रकाश में मिला देते हैं तथा अनंत अमर सत्ता की अनुभूति में अपनी तुच्छ व्यक्तिगत सत्ता का लोप कर देते हैं। ऐसा होने पर जहाँ एक ओर हमारा क्षुद्र अहम् नष्ट हो जाता है, वहिं दूसरी और वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है।

प्रार्थना क्या है ?

प्रार्थना का शाब्दिक अर्थ – ईश्वर के प्रति आत्म निवेदन या सच्ची विनय। प्रार्थना वाचिक भी हो सकती है और मानसिक भी। प्रार्थना परिस्थितिजन्य भी हो सकती है। प्रार्थना के निम्न और श्रेष्ठ अनेक स्वरूप और स्तर हैं। प्रार्थना का निम्नतम स्तर वह है जब व्यक्ति अपने शत्रु के विनाश या उसकी मृत्यु के लिए अथवा किसी के अनिष्ट के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है। श्रेष्ठतम स्तर की प्रार्थना में स्वार्थपूर्ण चेष्टाएँ नहीं होतीं। वह पूर्णत: निष्काम होती हैं। उसमें किसी प्रकार का भोग शामिल नहीं होता। सांसारिक विषयों में मन का भटकना प्रार्थना की प्रभावोत्पादकता को नष्ट कर देता है क्योंकि प्रार्थना में मन का पूर्ण रूप से स्थिर होना एवं अपने उपास्य में पूर्णतः केंद्रित होना अति आवश्यक है। सच्ची प्रार्थना संक्षिप्त होनी चाहिए, क्योंकि सुदीर्घ प्रार्थना में भटकने की आशंका बनी रहती है। श्रेष्ठतम प्रार्थना सर्वोच्च स्तर तक ले जाती है, जहाँ प्रार्थना की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उपासक अनंत में पूर्णतः विलीन हो चुका रहता है।

प्रार्थना के प्रकार

 1. व्यक्तिगत प्रार्थना

व्यक्तिगत प्रार्थना वह प्रार्थना है, जिसमें व्यक्ति स्वयं ही समर्पित होकर प्रार्थना करता है। इस प्रकार की प्रार्थना में ईश्वर के दिव्य गुणों के कीर्तन तथा देव कृपा प्राप्ति की भावना व्यक्त की जाती है।

2. सामूहिक प्रार्थना

ऐसी प्रार्थना जो किसी समूह में या गुरु-शिष्य के मध्य, समूह के कल्याणार्थ की जाती है वह सामूहिक प्रार्थना कहलाती है। इस प्रकार की प्रार्थना का अच्छा उदाहरण वेदों व उपनिषदों में मिलता है। उदा.- अथर्व वेद में गुरु एवं शिष्यों द्वारा एक साथ निम्नानुसार की गई प्रार्थना इस प्रकार की प्रार्थना का सुंदर उदाहरण है।

3. सार्वभौमिक प्रार्थना

यह प्रार्थना समस्त विश्व के कल्याणार्थ की जाने वाली प्रार्थना है। इसमें प्रार्थनाकर्ता के भीतर स्वयं के लिए कोई आकांक्षा, अपेक्षा नहीं होती और न ही किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई कामना होती है। व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु प्रार्थना करता है।

4. सकाम प्रार्थना

अपने स्वयं के तथा अपने बंधुओं मित्रों के सुख, स्वास्थ्य, धन-लाभ अथवा जय-विजय प्राप्ति हेतु की गई प्रार्थना ‘सकाम’ प्रार्थना है। किसी व्यक्ति के सुधारार्थ सकाम प्रार्थना इस प्रकार की जा सकती है। सुधरे वह सुशील बन, पालन कर आचार। कर्म धर्म में रत रहे, सब कुव्यसन निवार।

5. निष्काम प्रार्थना

स्वयं के चैतन्य भाव की जागृति, चित्त शुद्धि, मन की विमलता तथा पाप से निवृत्ति हेतु तथा नि:स्वार्थ भाव से परहित, परसुख, स्वास्थ्य, पदोन्नति आदि हेतु की गई प्रार्थना निष्काम प्रार्थना है। उपर्युक्त उल्लेखित अभीष्ट उद्देश्य यद्यपि एक प्रकार की कामना ही है। परंतु सांसारिक स्वार्थ न होने तथा परमार्थ होने में कर्ता का इस लोक सम्बंधी, सांसारिक सुख, यश आदि का कोई प्रयोजन न हो वह कर्म उसका निष्काम कर्म है। अतः ऐसे परमार्थ एवं आत्मकल्याण हेतु की गई प्रार्थना व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान में बहुत सहायक है तथा देश के सुधार हेतु भी की जा सकती है। उदा.- आत्म कल्याण हेतु निम्नानुसार प्रार्थना की जा सकती है। जगे चेतना विमलतम, हो सत्य सुप्रकाश। शांति सर्व आनंद हो, पाप ताप का नाश। बुद्धि वृद्धि, विवेक, बल, आत्म बल बढ़ जाए। सदिच्छा मानस बल बढ़े,धृति धर्म को पाए। इसी प्रकार देश सुधार हेतु निष्काम प्रार्थना का एक स्वरूप इस प्रकार हो सकता है। सदाचार सत्कर्म का, करें पालन सब लोग। मेल एकता साध के, हरे देश के रोग।

6. अनिष्टकारी प्रार्थना

ऐसी प्रार्थना जिसमें अपने शत्रु के विनाश अथवा किसी के अनिष्ट के लिए ईश्वर से निवेदन किया जाता है, वह अनिष्टकारी प्रार्थना कहलाती है। ऐसी प्रार्थना काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह आदि भावनाओं से प्रेरित स्वार्थपूर्ण चेष्टाओं से प्रभावित होती है। ऐसी प्रार्थना निम्नस्तरीय प्रार्थना होती है, उसमें किसी का कल्याण नहीं होता बल्कि प्रार्थना कर्त्ता स्वयं अपने आध्यात्म पतन का कारण बनता है। किसी को कष्ट, क्लेश देने हेतु प्रार्थना करना, किसी के शरीर को हानि या धन की हानि पहुँचाने हेतु प्रार्थना करना, अन्याय के लिए प्रार्थना करना, किसी निम्नस्तर की शक्ति को सच्चा बनाने के लिए प्रार्थना करना, किसी अपराधी को मुक्त कराने हेतु प्रार्थना करना आदि को निम्नस्तर का मानकर संतों द्वारा वर्जित किया गया है। दैनिक जीवन में प्रार्थना की उपयोगिता व महत्त्व मानव जीवन में प्रार्थना का बड़ा महत्त्व है। प्रार्थना की विभिन्न परिस्थितियाँ। जहाँ एक ओर संबल प्रदान करती हैं, वहीं दूसरी ओर भय मुक्त भी करती हैं। प्रार्थना जहाँ हमें जीवन जीने हेतु आधार प्रदान करती है वहीं हमारे पूरे व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है।

सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति का साधन मानवीय सम्पूर्ण स्वास्थ्य के तीन पक्ष हैं। प्रथम पक्ष शारीरिक पक्ष है जो स्थूल है। द्वितीय पक्ष मानसिक है जो सूक्ष्म है तथा तृतीय पक्ष आध्यात्मिक है जो आत्मा से सम्बंधित है। इन तीनों पक्षों में एक गहरा पारंपरिक सम्बंध और तालमेल है। प्रार्थना के अभाव में आध्यात्मिक पक्ष की निरंतर अवहेलना होती जाती है। इसके परिणाम स्वरूप आत्मीय पक्ष दु:खों से भर जाता है और तत्पश्चात् मन अशांत, अस्थिर और क्लेश युक्त हो जाता है।

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