दमा, श्वास, कफ के लिए मिट्टी की पट्टी बनाने की विधि और फायदे

शरीर के जिस अंग में रोग हो उसपर मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करना अत्यंत गुणकारी है। पट्टी को लपेटने के बाद उस स्थान पर ऊपर से गरम कपड़े या मोटे सूती कपड़े की सूखी पट्टी भली प्रकार लपेटें और मिट्टी सूखने तक विश्राम करें। मिट्टी के सूख जाने पर सूखी पट्टी हटाकर गीली पट्टी को खोल दें।अतः सबसे पहले मिट्टी बनाने की विधि जान लेनी चाहिए.

मिट्टी की पट्टी बनाने की विधि

मिट्टी की पट्टी बनाने के लिए सबसे पहले मिट्टी तैयार करें। इसके लिए किसी स्वच्छ स्थान से चिकनी, दोमट, पीली या भूरी पोता मिट्टी लाएँ। इस मिट्टी को डंडे से भली प्रकार कूटकर धूप में दो-तीन दिन सुखा दें। अब इस मिट्टी में से कंकड़ आदि निकाल दें। साफ की गई मिट्टी में इतना पानी मिलाएँ जितना यह सोख सके। अब इसे खुले स्थान में रख दें। लगभग बारह घंटे भीगने के बाद कलछी से उलट-पलटकर मुलायम पेस्ट बना लें। जिस अंग पर इस मिट्टी का प्रयोग करना हो उसकी आकृति के अनुकूल साँचेनुमा खादी की पट्टी काटें। पट्टी मोटी तथा सछिद्र होनी चाहिए। अब इस पट्टी पर मिट्टी के पेस्ट को एकसार लगाएँ। यदि लंबी पट्टी लपेटनी हो तो खादी की लंबी पट्टी पर मिट्टी की परत चढ़ाएँ। अब जिस प्रकार पट्टी पर मलहम लगाकर पीडि़त अंग पर बाँधा जाता है उसी प्रकार मिट्टी की इस पट्टी को पीडि़त अंग पर लपेटें। यदि शरीर के संपर्क में गीली पट्टी के स्पर्श से कुछ असुविधा हो तो उस अंग पर एक बारीक कपड़ा रखकर उसके ऊपर गीली पट्टी लपेटें। अंग की रचना के अनुसार यह पट्टी हाथ, पाँव, कमर, पेड़ू, सीना, रीढ़, गरदन, माथा या सिर पर लपेटी जा सकती है।

मिट्टी की पट्टी के रखरखाव

1. गीली मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करने से पहले यदि पीडि़त स्थान को हलका से सेंककर गरम कर लें तो अधिक लाभ होता है।

2. गीली पट्टी खोलने के बाद यदि अति आवश्यक हो तो गरम पानी से उस अंग की सफाई कर सकते हैं। सावधानियाँ 1. एक बार उपयोग में लाई गई पट्टी के कपड़े या मिट्टी का उपयोग दुबारा कदापि न करें।

3. किसी रोगी की प्रयोग की गई पट्टी को दूसरे रोगी के लिए कदापि प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4. दमा, श्वास, कफ, जुकाम, तेज दर्द, गठिया या अन्य गंभीर वायु विकार, गर्भावस्था तथा छोटे बच्चों के रोगों को दूर करने के लिए मिट्टी की पट्टी का प्रयोग न करें।

5. रोगी को अरुचिकर या असुविधाजनक लगने पर भी इस प्रकार की पट्टी का प्रयोग न करें।

6. तेज दर्द या रोग की गंभीर अवस्था में रोगी को चिकित्सक को दिखाएँ। विभिन्न अंगों की पट्टियाँ अंगों की आकृति के अनुसार अलग-अलग प्रकार की पट्टियाँ प्रयोग में लाएँ.

 

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