शरीर में वात प्रकृति को संतुलित करने के उपाय और नियम : Vata

वात प्रकृति का व्यक्ति अधिक लोगों के साथ नहीं रहना चाहता और शोरगुल पसंद नहीं करता। आधुनिक युग में तनाव और दबाव वात के असंतुलन को और बढ़ा सकते हैं। आरंभिक चरणों में शरीर असंतुलित अवस्था को स्वीकार करके उसे संतुलित करने का प्रयास करता है। वात को संतुलित करने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति शांत रहे, सही समय पर सोए, समय पर तथा सही मात्रा में भोजन करे। यह प्रकृति के अनुकूल है। विकृति

वात प्रकृति को संतुलित करने के उपाय —

वात को सब दोषों का राजा माना जाता है। यह पित्त तथा कफ प्रकृति की गतिविधियों को नियंत्रित तथा नियमित करता है। वात प्रकृति को संतुलित करके आप अन्य दोनों दोषों के लिए भी लाभ हासिल कर सकते हैं।बाहरी वातावरण में वात की तुलना वायु से की जा सकती है, जो बादलों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर धीरे या तेजी से ले जाती है। इसी प्रकार शरीर में वात भी पित्त तथा कफ की गतिविधियों को सक्रिय तथा उत्तेजित करता है। यह मेन स्विच बोर्ड की तरह है। जैसे ही इसे ऑन किया जाता है वैसे ही पूरे शरीर की गतिविधियाँ आरंभ हो जाती हैं। यह न केवल रक्त-संचार तथा श्वसन के लिए, बल्कि मस्तिष्क तथा शरीर की ऊर्जा के मूल स्तर पर कोशिकाओं के लिए भी जरूरी है।

1. तिल के तेल से मालिश करना 2. भोजन में पोषक आहार लेना, 3. शरीर को गरमी देना, 4. शरीर को पर्याप्त आराम देना, 5. तनाव तथा दबाव से दूर रहना, 6. शांत तथा मौन रहना और 7. अपनी आदतों को नियंत्रित करना।   8. वात प्रकृति को संतुलित करने का उपाय है—तिल के तेल की मालिश। 9. गरम पानी से स्नान करना। पर सिर के लिए हलके गरम पानी का प्रयोग। 10. शारीरिक तथा मानसिक विश्राम। 11. रात में दस बजे तक अवश्य सो जाना। 12. सुबह तथा शाम छह बजे पाँच-दस मिनट ध्यान करना। महाऋषि इंटरनेशनल ने इंद्रियातीत ध्यान विकसित किया है। उसे आजमाना अच्छा रहेगा। 13. अपने शरीर को गरम रखें। यह वात के लिए अच्छा है, क्योंकि उसका मूल स्वभाव ठंडा है। ठंड में न निकलें और ठंडा भोजन न करें। 14. वात को शमित करनेवाले खाद्य पदार्थ लें। नियमित रूप से तथा समय पर गरम भोजन करना चाहिए। नियमित भोजन में दो बार भोजन तथा एक बार अल्पाहार लेना चाहिए। दोपहर के भोजन से पहले सूखा या गीला अदरक तथा भोजन के बाद शतपुष्प (सौंफ) चबाना अच्छा रहता है, जो भोजन में रुचि जगाता है और पाचन को दुरुस्त करता है।

गरम या ठंडे पेय :

केवल गरम तरल पदार्थ लें, क्योंकि वे वात प्रकृति के लोगों के लिए लाभकारी होते हैं। 1. तनाव तथा मानसिक दबाव से दूर रहें। 2. तड़क-भड़कवाले संगीत तथा शोर से परहेज करें। 3. अपने घर को प्रकाश से परिपूर्ण, साफ तथा स्वच्छ रखें। 4. वात प्रकृति के लोगों के लिए धूप अच्छी होती है, इसलिए दरवाजे-खिड़कियाँ खुली रखें। वात प्रकृति के लोगों के लिए धूप का सेवन फायदेमंद होता है। लंबी अवधि तक बाहर न रहें। आपने आपको खुशनुमा तथा विनोदप्रिय पाठन-सामग्री में व्यस्त रखें। मादक पदार्थों से दूर रहें : शराब, चाय, कॉफी तथा धूम्रपान से दूर रहना चाहिए। चिंता तथा तनाव को टालने का प्रयत्न करें।

नेजल ड्रॉप (नसया) :

सिर, गला, आँख, कान तथा नाक की सभी बीमारियों के लिए नसया उत्तम चिकित्सा है। ठंडी जलवायु में नाक शुष्क हो जाती है, इसलिए तिल के तेल की पाँच बूँदें नाक में डालनी चाहिए। इसके बाद नाक की हलकी मालिश करें। ऐसा साइनसाइटिस के मामले में नहीं करना चाहिए, क्योंकि उसमें पहले से ही अवरोध मौजूद रहता है। तेल कफ को घनीभूत कर देता है, इस कारण अत्यधिक पीड़ा तथा सिरदर्द होता है। यह उपचार दिन में तीन से चार बार या इससे अधिक बार किया जा सकता है। साइनस के मरीजों को यह उपचार नहीं अपनाना चाहिए। अन्य सभी प्रकार के लोगों के लिए यह उपचार उपयोगी होता है। यह मस्तिष्क को शांत रखता है।

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