बीमारी के बाद बल-सर्जन के लिए सुप्त स्वस्तिकासन विधि: Swastikasana

बीमारी के बाद बल-सर्जन एवं श्रम-परिहार थकावट सबको सताने वाला विकार है, लेकिन इसका प्रमुख कारण ढूँढ़ना उतना ही कठिन। शारीरिक श्रम, मानसिक तनाव और बौद्धिक कार्य—इन सबके कारण थकावट आती है। मनुष्य के शरीर में इंद्रियाँ, मन और बुद्धि इस संपदा का व्यय ठीक तरह से न करते हुए उस पर अतिरिक्त भार लादने से उसकी सहनशीलता की सीमा खत्म हो जाती है और थकान आ जाती है। संभवतः थकान ‘लाल बत्ती’ है, जो रुकने का संकेत देती है, पर इस संकेत को नजरअंदाज करके उसका उल्लंघन करने पर कभी-कभी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। शारीरिक गतिविधि या परिश्रम करने से स्नायुओं पर तनाव पड़ने से लैक्टिक एसिड का संचय बढ़ने लगता है। लैक्टिक एसिड बढ़ने से थकान महसूस होने लगती है।

सुप्त स्वस्तिकासन – Swastikasana

नम वातावरण, भीड़-भाड़ की जगह या तंग कमरे में रहने से थकान का अनुभव अधिक होता है। खासकर नौकरी-भांधो के स्थान पर अथवा कारखाने में वायु का आवागमन ठीक न होने से वहाँ काम करनेवालों को शारीरिक थकान तो आती ही है, साथ ही बुद्धि भी काम करने में ठीक से साथ नहीं देती। ऐसे समय में काम की मंद गति, उत्सुकता का अभाव, लापरवाही, गलतियाँ आदि दोष पल्ले पड़ते हैं। ऐसे समय में आवश्यकता होती है शांति और आराम की, किसी हवादार स्थान की। अन्यथा थकान के पंजे अभिकाभिक कसते जाते हैं। हमारे शरीर में भी अत्यभिक कार्य का तनाव, मानसिक तनाव, भावावेग और बौद्धिक श्रम आदि से वायु का आवागमन ठीक न होकर शरीरांतर्गत पर्यावरण बिगड़ जाता है और थकान आ जाती है। शारीरिक परिश्रम से थकान आए तो समस्या का हल मुश्किल नहीं है, लेकिन कुछ लोगों को हमेशा थकान महसूस होती है।

शरीर दुबला होता जाता है, शरीर की क्षति होने लगती है, थोड़े से काम से भी थकान होकर तुरंत आराम की जरूरत होती है। काम और श्रम से थकान आना स्वाभाविक है और आराम-विश्राम के बाद उसका नष्ट होना भी निश्चित है। पर कुछ लोगों को खूब आराम और नींद के पश्चात् भी ताजगी महसूस नहीं होती, बल्कि दिन निकलने के पहले ही थकान लगती है और वे आलस्य के शिकार होते हैं। मानसिक तनाव से उत्पन्न थकान सिरदर्द, बदहजमी, निद्रानाश, विस्मरण आदि का कारण बनती है। उनका स्वभाव क्रोभाद्ध बनता है और शरीर तथा मन चिंताग्रस्त रहता है। इस प्रकार थकान से शारीरिक और मानसिक संतुलन बिगड़ने या शाम को काम से लौटने पर शरीर में जरा भी शक्ति और उत्साह नहीं रहता, यातायात की भीड़, चहल-पहल, मन में विचारों की उलझन और विपरीत जलवायु—इन सभी कारणों से दबे हुए व्यक्ति को ‘योगासन करो’ कहने पर वह निश्चित रूप से नकारात्मक रुख ही अपनाएगा।

सुप्त स्वस्तिकासन विधि- Swastikasana

1. कंबल की सीभाद्ध तह बिछाएँ और उस पर स्वस्तिकासन में बैठें।

2. श्वास छोड़ते हुए पीठ की ओर झुकें; परंतु जंघाओं के जमीन की ओर के दबाव को कम न करें। पीठ की ओर झुकते हुए कुहनियाँ और हथेलियाँ एक के बाद एक जमीन पर रखकर भाड़ भाद्धरे-भाद्धरे जमीन की ओर ले जाएँ। भाड़ जैसे-जैसे नीचे जाए वैसे-वैसे हाथों के और कुहनियों के ऊपर का दबाव कम करें।

3. शीर्ष-मध्य का भाग नीचे टिकाएँ और बाद में गरदन को खुला करते हुए सिर के पीछे का भाग टिकाएँ, जिससे पीठ का भाग जमीन पर टिकेगा।

4. रीढ़ की हड्डी को सीधो लंबा रखें। दोनों हाथ भाड़ के पार्श्व कोरों की दिशा में लंबे करें।

5. इस स्थिति में सीने को चौड़ा फैलाकर कंधो के पंखे जमीन पर रखें। स्वस्तिकासन में पैरों को तह करके बनाया गया क्रॉस एवं नाभि व सीने के मध्य को एक सीभा में रखें और सीने को सिकुड़ने न दें।

6. अब श्वास लेते हुए हाथ कुहनी से मोड़ें और हाथ उठाकर उसे सिर के ऊपर सीधो खींचें। हथेलियाँ छत की ओर मुड़ी हुई हों।

7. पैरों के क्रॉस एवं घुटनों को जमीन की ओर दबाते हुए भाड़ का भाग लंबा कीजिए और सीना उठाइए। इस स्थिति में सामान्य श्वासोच्छ्वास करते हुए 3 से 5 मिनट तक रहिए। भाद्धरे-भाद्धरे अवभि बढ़ाएँ।

8. श्वास लेते हुए हाथ पीछे के हिस्से के कोरों की दिशा में लाएँ। हथेलियाँ अंदर की तरफ मोड़ें।

9. श्वास छोड़ते हुए कुहनी और हथेलियाँ दबाते हुए भाड़ को ऊपर उठाइए। स्वस्तिकासन में बैठिए। अब पैरों का क्रॉस बदलिए और यही क्रिया दोहराइए। सुप्त स्वस्तिकासन में पैरों के मोड़ को खोलकर सीभा छोड़ने में हानि नहीं। लेकिन आसन को बदलते समय बैठी स्थिति में ही बदलें, जिससे स्वस्तिकासन की अवस्था में मजबूती रहती है।

Svastikasana

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